श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु की बाल-लीलाएँ  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  1.14.33 
आत्म लुकाइते प्रभु बलिला ताँहारे ।
आगे केन इहा, माता, ना शिखाले मोरे ॥33॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने अपनी माता से कहा, "आपने मुझे प्रारम्भ में यह व्यावहारिक दर्शन न सिखाकर आत्म-साक्षात्कार क्यों छुपाया?
 
Mahaprabhu said to his mother, "Why didn't you teach me this practical philosophy earlier? Why did you keep this method of self-realization hidden from me?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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