श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 13: श्री चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  1.13.59 
जगन्नाथ मिश्रवर - पदवी ‘पुरन्दर’ ।
नन्द - वसुदेव - रूप सद्गुण - सागर ॥59॥
 
 
अनुवाद
जगन्नाथ मिश्र को पुरंदर नाम दिया गया था। नंद महाराज और वसुदेव की तरह, वे भी सभी गुणों के सागर थे।
 
Jagannatha Mishra was given the title of "Purandara." Like Nanda Maharaja and Vasudeva, he was an ocean of all virtues.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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