| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 1: आदि लीला » अध्याय 13: श्री चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव » श्लोक 5 |
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| | | | श्लोक 1.13.5  | जय श्री - चैतन्यचन्द्रेर भक्त चन्द्र - गण ।
सबार प्रेम ज्योत्स्नाय उज्वल त्रिभुवन ॥5॥ | | | | | | | अनुवाद | | उन चन्द्रमाओं की जय हो जो प्रधान चन्द्रमा, भगवान चैतन्यचन्द्र के भक्त हैं! उनकी उज्ज्वल चन्द्रमा की चमक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करती है। | | | | All the moons who are devotees of the supreme moon, Chaitanya Mahaprabhu, whose radiant moonlight illuminates the entire universe. | | ✨ ai-generated | | |
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