श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 13: श्री चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  1.13.35 
तार मध्ये नीलाचले छय वत्सर ।
नृत्य, गीत, प्रेमभक्ति - दान निरन्तर ॥35॥
 
 
अनुवाद
इन चौबीस वर्षों में से छः वर्षों तक नीलांचल [जगन्नाथ पुरी] में उन्होंने निरंतर कीर्तन और नृत्य द्वारा भगवत्प्रेम वितरित किया।
 
For six of these twenty-four years in Nilachal (Jagannath Puri), he always distributed the love of God through kirtan and dance.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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