| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 1: आदि लीला » अध्याय 13: श्री चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव » श्लोक 107 |
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| | | | श्लोक 1.13.107  | केबा आसे केबा याय, केबा नाचे केबा गाय
सम्भालिते नारे कार बोल ।
खण्डिलेक दुःख - शोक, प्रमोद - पूरित लोक
मिश्र हैला आनन्दे विह्वल ॥107॥ | | | | | | | अनुवाद | | कोई समझ नहीं पा रहा था कि कौन आ रहा है और कौन जा रहा है, कौन नाच रहा है और कौन गा रहा है। न ही वे एक-दूसरे की भाषा समझ पा रहे थे। फिर भी सारा दुःख और शोक तुरंत दूर हो गया और लोग हर्षोल्लास से भर गए। इस प्रकार जगन्नाथ मिश्र भी आनंद से अभिभूत हो गए। | | | | No one could understand who was coming, who was going, who was dancing, and who was singing. No one could even understand each other's language. But what happened was that all the sadness and grief vanished instantly, and everyone was filled with joy. Jagannath Mishra was also overwhelmed with joy. | | ✨ ai-generated | | |
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