Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 12: अद्वैत आचार्य तथा गदाधर पण्डित के विस्तार  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  1.12.9 
केह त’ आचार्य आज्ञाय, केह त’ स्वतन्त्र ।
स्व - मत कल्पना करे दैव - परतन्त्र ॥9॥
 
 
अनुवाद
कुछ शिष्यों ने आचार्य के आदेशों को कठोरता से स्वीकार किया, तथा अन्य शिष्यों ने दैवी माया के प्रभाव में आकर स्वतंत्र रूप से अपने मत गढ़ लिए।
 
Some disciples followed the orders of the Acharya strictly and some others went astray under the influence of divine illusion and formed their own independent opinions.
तात्पर्य
यह पद छिन्न-भिन्नता की शुरुआत का वर्णन करता है। जब शिष्य अपने आध्यात्मिक गुरु के आदेश का पालन करने के सिद्धांत पर अडिग नहीं रहते हैं, तो तुरंत दो मत बन जाते हैं। आध्यात्मिक गुरु के मत से अलग किसी भी मत का कोई उपयोग नहीं है। आध्यात्मिक उन्नति में भौतिक रूप से गढ़े गए विचारों को घुसपैठ नहीं किया जा सकता है। वही विचलन है। आध्यात्मिक उन्नति को भौतिक विचारों के अनुरूप बनाने की कोई गुंजाइश नहीं है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)