केह त’ आचार्य आज्ञाय, केह त’ स्वतन्त्र ।
स्व - मत कल्पना करे दैव - परतन्त्र ॥9॥
Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93
Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
अनुवाद
कुछ शिष्यों ने आचार्य के आदेशों को कठोरता से स्वीकार किया, तथा अन्य शिष्यों ने दैवी माया के प्रभाव में आकर स्वतंत्र रूप से अपने मत गढ़ लिए।
Some disciples followed the orders of the Acharya strictly and some others went astray under the influence of divine illusion and formed their own independent opinions.
तात्पर्य
यह पद छिन्न-भिन्नता की शुरुआत का वर्णन करता है। जब शिष्य अपने आध्यात्मिक गुरु के आदेश का पालन करने के सिद्धांत पर अडिग नहीं रहते हैं, तो तुरंत दो मत बन जाते हैं। आध्यात्मिक गुरु के मत से अलग किसी भी मत का कोई उपयोग नहीं है। आध्यात्मिक उन्नति में भौतिक रूप से गढ़े गए विचारों को घुसपैठ नहीं किया जा सकता है। वही विचलन है। आध्यात्मिक उन्नति को भौतिक विचारों के अनुरूप बनाने की कोई गुंजाइश नहीं है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥