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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 12: अद्वैत आचार्य तथा गदाधर पण्डित के विस्तार  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  1.12.88 
चक्रवर्ती शिवानन्द सदा व्रजवासी ।
महाशाखा - मध्ये तेंहो सुदृढ़ विश्वासी ॥88॥
 
 
अनुवाद
शिवानन्द चक्रवर्ती, तैंतीसवीं शाखा, जो सदैव दृढ़ विश्वास के साथ वृन्दावन में रहते थे, गदाधर पंडित की एक महत्वपूर्ण शाखा माने जाते हैं।
 
Shivananda Chakravarti was the thirty-ninth branch. He lived in Vrindavan with strong faith and is considered an important branch of Gadadhara Pandita.
तात्पर्य
गौर-गणोद्देश-दीपिका (183) में उल्लेख है कि शिवानंद चक्रवर्ती पहले लवंग-मंजरी थे। यदुनंदन दास द्वारा लिखी गई शाखा-निर्णय में, गदाधर पंडित की अन्य शाखाओं का भी नाम दिया गया है, इस प्रकार है: (1) माधवाचार्य, (2) गोपाल दास, (3) हृदयानंद, (4) वल्लभ भट्ट (वल्लभ-सम्प्रदाय, या पुष्टिमार्ग-सम्प्रदाय, बहुत प्रसिद्ध है), (5) मधु पंडित (यह प्रसिद्ध भक्त खड़दा के पास, साँबोना-ग्राम नामक गाँव में रहता था, जो खड़दा स्टेशन से लगभग दो मील पूर्व में है, और उसने वृंदावन में गोपीनाथजी का मंदिर बनवाया), (6) अच्युतानंद, (7) चंद्रशेखर, (8) वक्रेश्वर पंडित, (9) दामोदर, (10) भगवान आचार्य, (11) अनंत आचार्यवर्य, (12) कृष्णदास, (13) परमानंद भट्टाचार्य, (14) भवानंद गोस्वामी, (15) चैतन्य दास, (16) लोकनाथ भट्ट (यह भक्त, जो यशोहर (जेसोर) जिले के तालखड़ी गाँव में रहता था और उसने राधारमण का मंदिर बनवाया था, नरसिम्हा दास ठाकुर का आध्यात्मिक गुरु था और भूमिगत गोस्वामी का एक महान मित्र था), (17) गोविंद आचार्य, (18) अक्रूर ठाकुर, (19) संकेत आचार्य, (20) प्रतापादित्य, (21) कमलाकांत आचार्य, (22) यादव आचार्य और (23) नारायण पडीहारी (जगन्नाथ पुरी का निवासी)।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)