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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 12: अद्वैत आचार्य तथा गदाधर पण्डित के विस्तार  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  1.12.85 
श्री - हरि आचार्य, सादि - पुरिया गोपाल ।
कृष्णदास ब्रह्मचारी, पुष्प - गोपाल ॥85॥
 
 
अनुवाद
उन्नीसवीं शाखा श्री हरि आचार्य थी; बीसवां, सादिपुरिया गोपाल; इक्कीसवाँ, कृष्णदास ब्रह्मचारी; और बाईसवां, पुष्पगोपाल।
 
Shri Hari Acharya was the nineteenth, Sadipuria Gopal was the twentieth, Krishnadas Brahmachari was the twenty-first and Pushpagopal was the twenty-second branch.
तात्पर्य
गौर-गणोद्देश-दीपिका (196 व 207) में उल्लेख है कि हरि आचार्य पहले कालाक्षी नामक गोपी थीं। सदीपुरिया गोपाल को पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) के विक्रमपुर में हरे कृष्ण आंदोलन के प्रचारक के रूप में मनाया जाता है। कृष्णदासी ब्रह्मचारी पहले सखियों के अष्ट-सखियों के रूप में जाने जाने वाले समूह में थीं। उनका नाम इंदुलेख था। कृष्णदास ब्रह्मचारी वृंदावन में रहते थे। राधा-दामोदर मंदिर में एक मकबरा है जिसे कृष्णदास का मकबरा कहा जाता है। कुछ लोगों का कहना है कि यह कृष्णदास ब्रह्मचारी का मकबरा है, और अन्य कहते हैं कि यह कृष्णदास कविराज गोस्वामी का है। किसी भी मामले में हम अपना सम्मान देते हैं क्योंकि वे दोनों इस युग की पतित आत्माओं में ईश्वर के प्रेम को वितरित करने में विशेषज्ञ थे। शाखा-निर्णय में उल्लेख है कि पुष्पगोपाल को पहले स्वर्णग्रामक के नाम से जाना जाता था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)