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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 12: अद्वैत आचार्य तथा गदाधर पण्डित के विस्तार  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  1.12.45 
आमारेह कभु येइ ना हय प्रसाद ।
तोमार चरणे आमि कि कैनु अपराध ॥45॥
 
 
अनुवाद
"कमलाकांत, आपने इतनी बड़ी कृपा की है कि मुझ पर भी आपने ऐसी कृपा नहीं की। मैंने आपके चरणकमलों में ऐसा कौन-सा अपराध किया है कि मुझ पर ऐसी कृपा न हुई?"
 
"The grace you have shown Kamalakant is so great that you have never shown such kindness to me. What sin have I committed against your lotus feet that you have not shown such mercy to me?"
तात्पर्य
यह प्रभु चैतन्य महाप्रभु द्वारा पहले अद्वैत आचार्य को दिये गये दंड का सन्दर्भ है। जब अद्वैत आचार्य प्रभु योग-वासिष्ठ पढ़ रहे थे, प्रभु चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें मारा, लेकिन उन्होंने कभी उन्हें अपने सामने आने से नहीं रोका। लेकिन कमलाकांत को प्रभु के सामने कभी न आने के आदेश के साथ दंडित किया गया था। इसलिए श्री अद्वैत आचार्य प्रभु चैतन्य महाप्रभु को प्रभावित करना चाहते थे कि उन्होंने कमलाकांत विश्वास को अधिक कृपा दिखाई है क्योंकि उन्होंने कमलाकांत को अपने सामने देखने से रोक दिया था, जबकि उन्होंने अद्वैत आचार्य के साथ ऐसा नहीं किया था। इसलिए कमलाकांत विश्वास को दिखाया गया कृपा, अद्वैत आचार्य को दिखाये गए कृपा से बड़ा था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)