Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 12: अद्वैत आचार्य तथा गदाधर पण्डित के विस्तार  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  1.12.42 
ये दण्ड पाइल श्री - शची भाग्यवती ।
से दण्ड प्रसाद अन्य लोक पाबे कति ॥42॥
 
 
अनुवाद
"माँ शचीदेवी को भी ऐसा ही दंड दिया गया था। उनसे अधिक भाग्यशाली कौन हो सकता है जिसे ऐसा दंड मिला?"
 
"Mother Shachidevi received a similar punishment. Who could be more fortunate than her to receive such a punishment?"
तात्पर्य
सीतादेवी को भी उसी प्रकार दंडित किया गया था, जैसा कि चैतन्य- भागवत, माघ्य-खंड, अध्याय बाईस में वर्णित किया गया है। सीतादेवी ने अपनी स्त्री प्रकृति को दर्शाते हुए, अद्वैता प्रभु पर अपने पुत्र को संन्यासी बनने के लिए प्रोत्साहित करने का आरोप लगाया। चैतन्य महाप्रभु ने इस आरोप को अपराध मानते हुए साचीदेवी को अद्वैता आचार्य के चरणों को स्पर्श करने के लिए कहा ताकि उन्होंने कथित रूप से किए गए अपराध को कम कर सकें।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)