श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 12: अद्वैत आचार्य तथा गदाधर पण्डित के विस्तार  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.12.4 
वृक्षेर द्वितीय स्कन्ध - आचार्य - गोसाञि ।
ताँर यत शाखा हइल, तार लेखा नाञि ॥4॥
 
 
अनुवाद
श्री अद्वैत प्रभु इस वृक्ष की दूसरी बड़ी शाखा थे। इसकी कई उपशाखाएँ हैं, लेकिन उन सभी का उल्लेख करना असंभव है।
 
Sri Advaita Prabhu was the second largest branch of that tree. That tree has many sub-branches, but it is impossible to mention them all.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)