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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 12: अद्वैत आचार्य तथा गदाधर पण्डित के विस्तार  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  1.12.38 
विश्वासेरे कहे , - तुमि बड़ भाग्यवान् ।
तोमारे करिल दण्ड प्रभु भगवान् ॥38॥
 
 
अनुवाद
कमलाकांत विश्वास को दुखी देखकर अद्वैत आचार्य प्रभु ने उनसे कहा, "आप बहुत भाग्यशाली हैं कि आपको परम भगवान, भगवान चैतन्य महाप्रभु द्वारा दंडित किया गया है।
 
Seeing Kamalakanta Biswas unhappy, Advaita Acharya Prabhu said to him, “You are extremely fortunate to have been punished by Lord Chaitanya Mahaprabhu.”
तात्पर्य
यह श्री अद्वैत प्रभु का एक आधिकारिक निर्णय है। वह स्पष्ट रूप से सलाह देते हैं कि जब सर्वोच्च भगवान के आदेश से व्यक्ति पर उल्टी परिस्थितियाँ आती हैं, तो दुखी नहीं होना चाहिए। एक भक्त को हमेशा उसे भाग्य प्राप्त करने से खुश रहना चाहिए जो सर्वोच्च भगवान द्वारा दिया गया है, जो किसी के निर्णय के अनुसार सुखद या अप्रिय लगता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)