Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 11: भगवान् नित्यानन्द के विस्तार  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  1.11.39 
आजन्म निमग्न नित्यानन्देर चरणे ।
निरन्तर बाल्य - लीला करे कृष्ण - सने ॥39॥
 
 
अनुवाद
जन्म से ही पुरुषोत्तम दास भगवान नित्यानंद प्रभु के चरणकमलों की सेवा में लीन रहते थे और सदैव भगवान कृष्ण के साथ बाल-क्रीड़ा में लीन रहते थे।
 
From birth, Purushottam Das Nityananda was immersed in the service of the Lord's lotus feet and was always engaged in childlike play with Krishna.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर अपने अनुभाष्य में लिखते हैं, "पिता-पुत्र सदाशिव कविराज और नागर पुरुषोत्तम को चैतन्य-भागवत में महाभाग्यवान बताया गया है। वे वैद्य जाति से थे। गौर-गणोद्देश-दीपिका के 156वें श्लोक में बताया गया है कि कृष्ण की अतिप्रिय गोपी चन्द्रावली ने बाद में सदाशिव कविराज के रूप में जन्म लिया था। श्लोक 194 और 200 में बताया गया है कि सदाशिव कविराज के पिता कंसारि सेन पहले कृष्ण के लीला काल में रत्नावली नामक गोपी थीं। सदाशिव कविराज के परिवार के सभी सदस्य भगवान चैतन्य महाप्रभु के महान भक्त थे। पुरुषोत्तम दास ठाकुर कभी-कभी चाकदाहा और शिमुराली रेलवे स्टेशन के पास सुखसागर में रहते थे। पुरुषोत्तम ठाकुर द्वारा स्थापित सभी देवता पहले बेलेडांगा-ग्राम में स्थित थे, लेकिन जब मंदिर नष्ट हो गया तो देवताओं को सुखसागर ले जाया गया। जब वह मंदिर गंगा की धारा में विलीन हो गया, तो देवताओं को जाह्नवा-माता की मूर्ति के साथ साहेबडांगा बेडिग्राम में लाया गया। चूँकि उस स्थान को भी नष्ट कर दिया गया है, इसलिए अब सभी देवता चाँडूडे-ग्राम नामक गाँव में स्थित हैं, जो कि ऊपर बताए अनुसार पालपाड़ा से एक मील की दूरी पर स्थित है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)