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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 11: भगवान् नित्यानन्द के विस्तार  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  1.11.31 
नित्यानन्द - प्रियभृत्य पण्डित धनञ्जय ।
अत्यन्त विरक्त, सदा कृष्ण - प्रेममयं ॥31॥
 
 
अनुवाद
नित्यानंद प्रभु के सोलहवें प्रिय सेवक धनंजय पंडित थे। वे अत्यंत त्यागी थे और सदैव कृष्ण प्रेम में लीन रहते थे।
 
Dhananjaya Pandit was Nityananda Prabhu's sixteenth beloved servant. He was deeply detached and always immersed in Krishna's love.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर अपने अनुभाष्य में लिखते हैं, "पंडित धनंजय कटवा के शीतल नामक गांव के निवासी थे। वह बारह गोपालों में से एक थे। गौर-गणोद्देश-दीपिका (127) के अनुसार उनका पूर्व नाम वसुदामा था। शीतल-ग्राम बर्धमान जिले में मंगलकोट पुलिस स्टेशन और कैचरा पोस्ट ऑफिस के पास स्थित है। बर्धमान से कटवा जाने वाले संकीर्ण रेलवे पर कटवा से लगभग नौ मील दूर कैचरा नामक एक रेलवे स्टेशन है। इस स्टेशन से शीतल पहुंचने के लिए आपको लगभग एक मील उत्तर-पूर्व जाना होगा। मंदिर मिट्टी की दीवारों वाला एक फूस का घर था। कुछ समय पहले, बाजारवाना काबासी के जमींदारों, मुल्लिकों ने मंदिर बनाने के उद्देश्य से एक बड़ा घर बनवाया था, परंतु पिछले पैंसठ वर्षों से मंदिर टूट-फूट कर बंद पड़ा है। पुराने मंदिर की नींव आज भी दिखाई देती है। मंदिर के पास एक तुलसी स्तंभ है, और हर साल कार्तिक (अक्टूबर-नवंबर) के महीने में धनंजय के अवतरण दिवस का आयोजन किया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि कुछ समय के लिए पंडित धनंजय श्री चैतन्य महाप्रभु के निर्देशन में एक संकीर्तन मंडली में थे, और फिर वह वृंदावन चले गए। वृंदावन जाने से पहले, वह कुछ समय सांचाड़ापाँचाड़ा नामक एक गांव में रहे, जो मेमारी रेलवे स्टेशन से छह मील दक्षिण में है। कभी-कभी इस गांव को 'धनंजय का स्थान' (धनंजयरा पाटा) के रूप में भी जाना जाता है। कुछ समय बाद, उन्होंने पूजा की जिम्मेदारी अपने एक शिष्य को सौंप दी और वृंदावन वापस चले गए। वृंदावन से शीतल-ग्राम लौटने के बाद, उन्होंने मंदिर में गौरासुंदर की एक मूर्ति स्थापित की। पंडित धनंजय के वंशज आज भी शीतल-ग्राम में रहते हैं और मंदिर की पूजा देखभाल करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)