| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 1: आदि लीला » अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ » श्लोक 93 |
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| | | | श्लोक 1.10.93  | षोड़श वत्सर कैल अन्तरङ्ग - सेवन ।
स्वरूपेर अन्तर्धाने आइला वृन्दावन ॥93॥ | | | | | | | अनुवाद | | उन्होंने जगन्नाथ पुरी में सोलह वर्षों तक भगवान की गोपनीय सेवा की, और भगवान तथा स्वरूप दामोदर दोनों के अन्तर्धान हो जाने के बाद, वे जगन्नाथ पुरी छोड़कर वृन्दावन चले गये। | | | | He stayed in Jagannath Puri and performed secret service of Mahaprabhu for sixteen years and after the disappearance of both Mahaprabhu and Swarup Damodar, he left Jagannath Puri and went to Vrindavan. | | ✨ ai-generated | | |
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