| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 1: आदि लीला » अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ » श्लोक 69 |
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| | | | श्लोक 1.10.69  | प्रभुर अतिप्रिय दास भगवान्पण्डित ।
याँर देहे कृष्ण पूर्वे हैला अधिष्ठित ॥69॥ | | | | | | | अनुवाद | | तीसवीं शाखा भगवान पंडित की थी। वे भगवान के अत्यंत प्रिय सेवक थे, किन्तु इससे पहले भी वे भगवान कृष्ण के महान भक्त थे और सदैव भगवान को अपने हृदय में रखते थे। | | | | The 30th branch was Lord Pandit. He was a very dear servant of Mahaprabhu, but in his previous life he was also a great devotee of Lord Krishna and always kept the Lord in his heart. | | ✨ ai-generated | | |
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