श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  1.10.6 
अतएव ताँ - सबारे क रि’ नमस्कार ।
नाम - मात्र करि, दोष ना लबे आमार ॥6॥
 
 
अनुवाद
मैं उनके प्रति सम्मान प्रकट करते हुए उन्हें प्रणाम करता हूँ। मैं उनसे अनुरोध करता हूँ कि वे मेरे अपराधों पर ध्यान न दें।
 
I offer my respectful obeisances to them all. I request them not to dwell on my transgressions.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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