| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 1: आदि लीला » अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ » श्लोक 47 |
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| | | | श्लोक 1.10.47  | ताँर लीला वर्णियाछेन वृन्दावन - दास ।
येबा अवशिष्ट, आगे करिब प्रकाश ॥47॥ | | | | | | | अनुवाद | | श्रील वृन्दावनदास ठाकुर ने अपने चैतन्यभागवत में हरिदास ठाकुर की लीलाओं का विशद वर्णन किया है। जो कुछ भी वर्णन नहीं किया गया है, उसे मैं इस पुस्तक में आगे चलकर समझाने का प्रयास करूँगा। | | | | Srila Vrindavana Dasa Thakura has described Haridasa Thakura's pastimes in detail in the Chaitanya Bhagavata. Whatever remains, I will attempt to explain later in this book. | | ✨ ai-generated | | |
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