श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 10: चैतन्य-वृक्ष के स्कन्ध, शाखाएँ तथा उपशाखाएँ  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  1.10.45 
प्रह्लाद - समान ताँर गुणेर तरङ्ग ।
यवन - ताड़नेओ याँर नाहिक भू - भङ्ग ॥45॥
 
 
अनुवाद
उनके सद्गुणों की लहरें प्रह्लाद महाराज जैसी थीं। मुसलमान शासक द्वारा सताए जाने पर भी उन्होंने ज़रा भी आपत्ति नहीं जताई।
 
His radiance of excellent qualities was like that of Prahlada Maharaja. When the Muslim ruler punished him, he did not even raise his eyebrows.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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