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श्लोक 159
श्लोक
1.10.159
एइ - मत सङ्ख्यातीत चैतन्य - भक्त - गण ।
दिंमात्र लिखि, सम्यक्ना याय कथन ॥159॥
अनुवाद
मैं भगवान चैतन्य के असंख्य भक्तों में से केवल कुछ अंशों का ही उल्लेख कर रहा हूँ। उन सबका पूर्णतः वर्णन करना संभव नहीं है।
Thus, I am listing only a fraction of Mahaprabhu's countless devotees. It is not possible to describe them all.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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