श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 9: अद्वैत आचार्य की महिमा  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  3.9.47 
সম্ভ্রমে অদ্বৈত পাদ-পদ্মে নমস্করি’
আসন দিলেন, বসিলেন গৌরহরি
सम्भ्रमे अद्वैत पाद-पद्मे नमस्करि’
आसन दिलेन, वसिलेन गौरहरि
 
 
अनुवाद
अद्वैत ने भगवान के चरण कमलों में आदरपूर्वक प्रणाम किया और फिर भगवान ने एक आसन दिया जिस पर गौरहरि बैठ गये।
 
Advaita respectfully bowed at the Lord's lotus feet and then the Lord offered a seat on which Gaurahari sat.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)