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श्लोक 3.9.13  |
মুষ্ট্য্-এক তণ্ডুল প্রভু, রান্ধিব আপন
হস্ত মোর ধন্য হৌ তোমার ভক্ষণে” |
मुष्ट्य्-एक तण्डुल प्रभु, रान्धिब आपन
हस्त मोर धन्य हौ तोमार भक्षणे” |
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| अनुवाद |
| "मैं तो बस मुट्ठी भर चावल पकाती हूँ। कृपया इसे स्वीकार करें ताकि मेरे हाथ महिमावान हो जाएँ।" |
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| "I'm just cooking a handful of rice. Please accept it so my hands can be glorified." |
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