श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 8: महाप्रभु के नरेंद्र सरोवर में जल खेल  »  श्लोक 135
 
 
श्लोक  3.8.135 
সর্বদাই প্রাণাযাম—এই সে যতি-ধর্ম
নাচিবে, কাঙ্দিবে এ কি সন্ন্যাসীর কর্ম”
सर्वदाइ प्राणायाम—एइ से यति-धर्म
नाचिबे, काङ्दिबे ए कि सन्न्यासीर कर्म”
 
 
अनुवाद
"एक संन्यासी का कर्तव्य है कि वह सदैव प्राणायाम का अभ्यास करे, लेकिन वह तो नाच रहा है और रो रहा है। क्या संन्यासी का यही काम है?"
 
"It is the duty of a sannyasi to always practice pranayama, but he is dancing and crying. Is this the work of a sannyasi?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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