সর্বদাই প্রাণাযাম—এই সে যতি-ধর্ম
নাচিবে, কাঙ্দিবে এ কি সন্ন্যাসীর কর্ম”
सर्वदाइ प्राणायाम—एइ से यति-धर्म
नाचिबे, काङ्दिबे ए कि सन्न्यासीर कर्म”
अनुवाद
"एक संन्यासी का कर्तव्य है कि वह सदैव प्राणायाम का अभ्यास करे, लेकिन वह तो नाच रहा है और रो रहा है। क्या संन्यासी का यही काम है?"
"It is the duty of a sannyasi to always practice pranayama, but he is dancing and crying. Is this the work of a sannyasi?"
तात्पर्य
जो भगवान के भक्त नहीं कहलाते हैं तथा स्वयं को संन्यासी कहते हैं उनका काम हमेशा पूरक, कुंम्भक और रेचक करते रहना है, परंतु त्रिदण्डी संन्यासी तीनों वृत्तियों - शरीर, मन और वाणी - को वश में रखने के काम को अपनाते हैं। कृष्ण की सेवा में तत्पर रहनेवाले सच्चे त्रिदण्डी संन्यासियों का कर्तव्य है कि मौन धारण न करें, अपितु कीर्तन करें, भक्तों से ईर्ष्या रखने वालों पर क्रोध करें, भक्तों से मित्रता करें और शरीर, मन और वाणी को विषयभोग के लिए प्रेरित करने के बजाय कृष्ण की सेवा में लगाएँ। परंतु मूर्ख और अभिमानी लोग कृष्ण के लिए प्रेम में उमड़ते हुए नाचने और गाने को भौतिक उपभोग पर आधारित नाचने और गाने के समान समझते हैं। जो लोग भौतिकता और आध्यात्मिकता को मिलाने वाले होने का ढोंग करते हैं उनका यही मूर्खतापूर्ण व्यवहार है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥