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श्लोक 3.8.135  |
সর্বদাই প্রাণাযাম—এই সে যতি-ধর্ম
নাচিবে, কাঙ্দিবে এ কি সন্ন্যাসীর কর্ম” |
सर्वदाइ प्राणायाम—एइ से यति-धर्म
नाचिबे, काङ्दिबे ए कि सन्न्यासीर कर्म” |
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| अनुवाद |
| "एक संन्यासी का कर्तव्य है कि वह सदैव प्राणायाम का अभ्यास करे, लेकिन वह तो नाच रहा है और रो रहा है। क्या संन्यासी का यही काम है?" |
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| "It is the duty of a sannyasi to always practice pranayama, but he is dancing and crying. Is this the work of a sannyasi?" |
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