उत्तरा रामा-चरित (3.23) में कहा गया है:वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपिलोकत्तराणां चेतसि को हि विज्ञातुमईश्वरः"साधारण व्यवहार से ऊपर उठे हुओं के हृदय कभी वज्र से भी कठोर होते हैं और कभी फूल से भी कोमल। ऐसे महान व्यक्तियों में विरोधाभास को कौन समझ सकता है?"