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श्लोक 3.7.72  |
স্বানুভাবানন্দে দুই—মুকুন্দ, অনন্ত
কি-রূপে কি কহে কে জানিব তার অন্ত |
स्वानुभावानन्दे दुइ—मुकुन्द, अनन्त
कि-रूपे कि कहे के जानिब तार अन्त |
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| अनुवाद |
| मुकुंद और अनंत ने अपने आनंदित भाव में जो कहा, उसे कौन पूरी तरह समझ सकता है? |
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| Who can fully understand what Mukunda and Ananta said in their blissful mood? |
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