श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 7: श्री गदाधर के बगीचे में लीलाएँ  »  श्लोक 72
 
 
श्लोक  3.7.72 
স্বানুভাবানন্দে দুই—মুকুন্দ, অনন্ত
কি-রূপে কি কহে কে জানিব তার অন্ত
स्वानुभावानन्दे दुइ—मुकुन्द, अनन्त
कि-रूपे कि कहे के जानिब तार अन्त
 
 
अनुवाद
मुकुंद और अनंत ने अपने आनंदित भाव में जो कहा, उसे कौन पूरी तरह समझ सकता है?
 
Who can fully understand what Mukunda and Ananta said in their blissful mood?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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