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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 3: अंत्य-खण्ड
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अध्याय 7: श्री गदाधर के बगीचे में लीलाएँ
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श्लोक 62
श्लोक
3.7.62
পরমার্থে মহাদেব—অনন্ত-জীবন
নাগ-ছলে অনন্ত ধরেন সর্ব-ক্ষণ
परमार्थे महादेव—अनन्त-जीवन
नाग-छले अनन्त धरेन सर्व-क्षण
अनुवाद
"वास्तव में महादेव अनंत को अपना प्राण और आत्मा मानते हैं। इसलिए वे अनंत को सदैव अपने गले में सर्प रूप में लपेटे रखते हैं।"
"In fact, Mahadev considers Anant as his life and soul. That is why he always keeps Anant wrapped around his neck in the form of a snake."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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