श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 7: श्री गदाधर के बगीचे में लीलाएँ  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  3.7.61 
নাগ-বিভুষণ যেন ধরেন শঙ্করে
তাহা নাহি সর্ব-জনে বুঝিবারে পারে
नाग-विभुषण येन धरेन शङ्करे
ताहा नाहि सर्व-जने बुझिबारे पारे
 
 
अनुवाद
"फिर भी लोग इसे नहीं समझ पाते, जैसे वे यह नहीं समझ पाते कि शंकर अपने शरीर को सर्प से क्यों सजाते हैं।
 
“Yet people don’t understand it, just as they don’t understand why Shankara adorns his body with a snake.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)