श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 7: श्री गदाधर के बगीचे में लीलाएँ  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  3.7.40 
স্বর্ণ-মুক্তা-হীরা-কসা-রুদ্রাক্ষাদি রূপে
নব-বিধা ভক্তি ধরিযাছ নিজ-সুখে
स्वर्ण-मुक्ता-हीरा-कसा-रुद्राक्षादि रूपे
नव-विधा भक्ति धरियाछ निज-सुखे
 
 
अनुवाद
“आप सोने, मोती, हीरे और रुद्राक्ष से सजे आभूषणों के रूप में भक्ति की नौ प्रक्रियाओं से खुद को सजाने में आनंद लेते हैं।
 
“You take pleasure in adorning yourself with the nine processes of devotion in the form of ornaments adorned with gold, pearls, diamonds and Rudraksha.
तात्पर्य
कसा शब्द का अर्थ है "सजना" या "जड़ा हुआ"।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)