श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 7: श्री गदाधर के बगीचे में लीलाएँ  »  श्लोक 123
 
 
श्लोक  3.7.123 
কি অদ্ভুত প্রীতি নিত্যানন্দ-গদাধরে
একের অপ্রিয আরে সম্ভাষা না করে
कि अद्भुत प्रीति नित्यानन्द-गदाधरे
एकेर अप्रिय आरे सम्भाषा ना करे
 
 
अनुवाद
नित्यानंद और गदाधर में कितना अद्भुत स्नेह है! वे दोनों कभी भी किसी ऐसे व्यक्ति से बात नहीं करते थे जो उन्हें नापसंद हो।
 
What a wonderful affection Nityananda and Gadadhara had! They never spoke to anyone they disliked.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)