श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 7: श्री गदाधर के बगीचे में लीलाएँ  »  श्लोक 116
 
 
श्लोक  3.7.116 
দেখি’ শ্রী-মুরলী-মুখ অঙ্গের ভঙ্গিমা
নিত্যানন্দ-আনন্দ-অশ্রুর নাহি সীমা
देखि’ श्री-मुरली-मुख अङ्गेर भङ्गिमा
नित्यानन्द-आनन्द-अश्रुर नाहि सीमा
 
 
अनुवाद
जब नित्यानंद प्रभु ने गोपीनाथ के सुंदर मुख को देखा, जो बांसुरी से सुशोभित था, तो उनके प्रेमाश्रु रुक नहीं सके।
 
When Nityananda Prabhu saw the beautiful face of Gopinatha, adorned with the flute, his tears of love could not be stopped.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)