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श्लोक 3.5.80  |
হেন সে আনন্দ হৈল রাঘব-শরীরে
কোন্ বিধি করিবেন, কিছুই না স্ফুরে |
हेन से आनन्द हैल राघव-शरीरे
कोन् विधि करिबेन, किछुइ ना स्फुरे |
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| अनुवाद |
| राघव का शरीर इतने आनंद से भर गया कि उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। |
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| Raghav's body was filled with so much pleasure that he did not understand what to do. |
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