श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.5.8 
শ্রী-চরণ বক্ষে করি’ পণ্ডিত-ঠাকুর
উচ্চৈঃ-স্বরে দীর্ঘ-শ্বাসে কান্দেন প্রচুর
श्री-चरण वक्षे करि’ पण्डित-ठाकुर
उच्चैः-स्वरे दीर्घ-श्वासे कान्देन प्रचुर
 
 
अनुवाद
पंडित ठाकुर ने भगवान के चरण कमलों को अपनी छाती से लगा लिया और गहरी साँस लेकर जोर से रोने लगे।
 
Pandit Thakur held the Lord's lotus feet to his chest and, taking a deep breath, began to cry loudly.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)