श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 726
 
 
श्लोक  3.5.726 
রঘুনাথ-বৈদ্য উপাধ্যায মহামতি
যাঙ্র দৃষ্টি-পাতে কৃষ্ণে হয রতি মতি
रघुनाथ-वैद्य उपाध्याय महामति
याङ्र दृष्टि-पाते कृष्णे हय रति मति
 
 
अनुवाद
रघुनाथ वैद्य उपाध्याय परम उदार थे। उनकी दृष्टि मात्र से ही मन में कृष्ण के प्रति आसक्ति जागृत हो जाती थी।
 
Raghunath Vaidya Upadhyay was very generous. The mere sight of him aroused attachment towards Krishna in the mind.
तात्पर्य
राघुनाथ वैद्य उपाध्याय के विवरण हेतु, चैतन्य-चरितामृत, आदी-लीला, अध्याय ग्यारह, पाठ 22 और उस पर अनुभाष्य टीका का अवलोकन करें।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)