श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 658
 
 
श्लोक  3.5.658 
নিরন্তর দুষ্ট-সঙ্গে করি ডাকাচুরি
পরহিṁসা বহি জন্মে আর নাহি করি
निरन्तर दुष्ट-सङ्गे करि डाकाचुरि
परहिꣳसा वहि जन्मे आर नाहि करि
 
 
अनुवाद
"मैं दुष्ट लोगों की संगति में सदैव चोरी करता हूँ। जन्म से ही मैंने दूसरों पर हिंसा के अलावा कुछ नहीं किया है।"
 
"I always steal in the company of evil people. From birth I have done nothing but violence to others."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)