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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 3: अंत्य-खण्ड
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अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ
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श्लोक 651
श्लोक
3.5.651
বিপ্রের অত্যন্ত প্রেম-বিকার দেখিযাজি
জ্ঞাসিল নিত্যানন্দ ঈষত্ হাসিযা
विप्रेर अत्यन्त प्रेम-विकार देखियाजि
ज्ञासिल नित्यानन्द ईषत् हासिया
अनुवाद
उस ब्राह्मण में आनंदमय प्रेम के परिवर्तन को देखकर नित्यानंद मुस्कुराये और उससे पूछा।
Seeing the transformation of blissful love in that Brahmin, Nityananda smiled and asked him.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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