श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 530
 
 
श्लोक  3.5.530 
পর-বধে দযা-মাত্র নাহিক শরীরে
নিরন্তর দস্যু-গণ-সṁহতি বিহরে
पर-वधे दया-मात्र नाहिक शरीरे
निरन्तर दस्यु-गण-सꣳहति विहरे
 
 
अनुवाद
वह निर्दयतापूर्वक दूसरों की हत्या करता था और हमेशा अन्य डाकुओं के साथ रहता था।
 
He would mercilessly kill others and always lived with other bandits.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)