श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 470
 
 
श्लोक  3.5.470 
দেখিযা অদ্বৈত নিত্যানন্দের শ্রী-মুখ
হেন নাহি জানেন জন্মিল কোন সুখ
देखिया अद्वैत नित्यानन्देर श्री-मुख
हेन नाहि जानेन जन्मिल कोन सुख
 
 
अनुवाद
जब अद्वैत ने नित्यानंद का चेहरा देखा, तो वह समझ नहीं सका कि वह कितना प्रसन्न हो गया।
 
When Advaita saw Nityananda's face, he could not understand how happy he became.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)