श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 462
 
 
श्लोक  3.5.462 
রাত্রি-দিনে ক্ষুধা-তৃষ্ণা নাহি নিদ্রা-ভয
সর্ব-দিকে হৈল হরি-সঙ্কীর্তন-ময
रात्रि-दिने क्षुधा-तृष्णा नाहि निद्रा-भय
सर्व-दिके हैल हरि-सङ्कीर्तन-मय
 
 
अनुवाद
दिन हो या रात, लोगों को भूख, प्यास, भय या नींद का कोई एहसास नहीं होता था। चारों ओर प्रभु के पवित्र नाम के सामूहिक कीर्तन से गूंज उठता था।
 
Day or night, the people felt no hunger, thirst, fear, or sleep. The whole world resounded with the collective chanting of the Lord's holy name.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)