श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 437
 
 
श्लोक  3.5.437 
অদ্বৈতের প্রাণ-নাথ—শ্রী-কৃষ্ণ-চৈতন্য
যাঙ্র ভক্তি-প্রসাদে অদ্বৈত সত্য ধন্য
अद्वैतेर प्राण-नाथ—श्री-कृष्ण-चैतन्य
याङ्र भक्ति-प्रसादे अद्वैत सत्य धन्य
 
 
अनुवाद
श्री कृष्ण चैतन्य अद्वैत के प्रिय भगवान हैं। भगवान चैतन्य की भक्तिमय सेवा के परिणामस्वरूप अद्वैत वास्तव में गौरवशाली बन गया।
 
Sri Krishna is the beloved Lord of Chaitanya Advaita. Advaita became truly glorious as a result of the devotional service of Lord Chaitanya.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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