श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 430
 
 
श्लोक  3.5.430 
সেবক-বত্সল প্রভু নিত্যানন্দ-রায
ব্রহ্মার দুর্লভ রস ইঙ্গিতে ভুঞ্জায
सेवक-वत्सल प्रभु नित्यानन्द-राय
ब्रह्मार दुर्लभ रस इङ्गिते भुञ्जाय
 
 
अनुवाद
भगवान नित्यानन्द प्रभु अपने सेवकों के प्रति स्नेही थे। उन्होंने उन्हें प्रेम की ऐसी मधुरता प्रदान की जो ब्रह्मा को भी दुर्लभ थी।
 
Lord Nityananda Prabhu was affectionate towards his devotees. He bestowed upon them a sweetness of love that was rare even for Brahma.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)