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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 3: अंत्य-खण्ड
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अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ
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श्लोक 426
श्लोक
3.5.426
বাহ্য নাহি শ্রী-চৈতন্য-দাসের শরীরে
ব্যাঘ্র তাডাইযা যায বনের ভিতরে
बाह्य नाहि श्री-चैतन्य-दासेर शरीरे
व्याघ्र ताडाइया याय वनेर भितरे
अनुवाद
श्री चैतन्यदास के शरीर में बाह्य चेतना का कोई चिन्ह नहीं था। वे जंगल में बाघों का पीछा करते रहते थे।
There was no trace of external consciousness in Sri Chaitanyadas's body. He was constantly chasing tigers in the jungle.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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