श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 357
 
 
श्लोक  3.5.357 
দরশন-মাত্র সর্ব-জীব মুগ্ধ হয
নাম-তত্ত্ব দুই—নিত্যানন্দ-রস-ময
दरशन-मात्र सर्व-जीव मुग्ध हय
नाम-तत्त्व दुइ—नित्यानन्द-रस-मय
 
 
अनुवाद
उन्हें देखकर सभी जीव आश्चर्यचकित हो गए। परम आनंदमय नित्यानंद, परमेश्वर के पवित्र नाम और रूप का संयुक्त रूप है।
 
All living entities were astonished to see Him. The supremely blissful Nityananda is the combined form of the holy name and form of the Supreme Lord.
तात्पर्य
चूँकि श्री नित्यानंद प्रभु ने अपने ऊपर अनेक मूल्यवान गहने और वस्त्र धारण किए थे, इसलिए मूर्ख लोगों ने देखा कि वे वैकुंठ के वैभवमय भाव में लीन हैं, न कि वृंदावन के दिव्य भाव में। साधारण गरीब लोग, जो गरीबी के कारण खुद को निराश्रित मानते थे, विभिन्न आभूषणों से अपने आप को सजाने की उनकी वैभवपूर्ण अभिव्यक्ति को देखते हुए अवधूत श्री नित्यानंद के चरण कमलों पर अपराध नहीं करते थे। इसके विपरीत, क्योंकि वे आभूषण वैभव से विचलित लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए पहने गए थे, वे दंग रह गए और उनमें कृष्ण की सेवा से संबंधित मिठास और विषय खोजे।

श्री नित्यानंद प्रभु प्रत्यक्ष स्वयं-प्रकाश-तत्व हैं। भगवान का अलौकिक नाम और स्वयं भगवान आपस में जुड़कर प्रकट होते हैं स्वयं-प्रकाश नित्यानंद के रूप में, दिव्य सुख के भंडार। श्री नित्यानंद प्रभु और नाम श्री नित्यानंद सबसे आनंददायक दिव्य वस्तुएँ हैं। यह जीवों को श्री नित्यानंद की कृपा से प्रकट किया गया था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)