श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 348
 
 
श्लोक  3.5.348 
প্রসন্ন শ্রী-মুখ—কোটি শশধর জিনি’
হাসিযা করেন নিরবধি হরি-ধ্বনি
प्रसन्न श्री-मुख—कोटि शशधर जिनि’
हासिया करेन निरवधि हरि-ध्वनि
 
 
अनुवाद
उनका मनोहर मुख करोड़ों चन्द्रमाओं की शोभा को भी मात कर रहा था। वे निरन्तर हरि नाम का जप करते हुए मुस्करा रहे थे।
 
His beautiful face surpassed the beauty of millions of moons. He smiled and continuously chanted the name of Hari.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)