श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 334
 
 
श्लोक  3.5.334 
ইচ্ছা মাত্র সর্ব-অলঙ্কার সেই ক্ষণে
উপসন্ন আসিযা হৈল বিদ্যমানে
इच्छा मात्र सर्व-अलङ्कार सेइ क्षणे
उपसन्न आसिया हैल विद्यमाने
 
 
अनुवाद
जैसे ही उनमें वह इच्छा जागृत हुई, वहाँ सभी प्रकार के आभूषण प्रकट हो गये।
 
As soon as that desire arose in him, all kinds of ornaments appeared there.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)