श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 257
 
 
श्लोक  3.5.257 
সুকৃতি মাধব-ঘোষ—কীর্তনে তত্পর
হেন কীর্তনীযা নাহি পৃথিবী-ভিতর
सुकृति माधव-घोष—कीर्तने तत्पर
हेन कीर्तनीया नाहि पृथिवी-भितर
 
 
अनुवाद
परम पावन माधव घोष कीर्तन में निपुण थे। उनके समान कीर्तन गुरु सम्पूर्ण विश्व में कोई नहीं था।
 
His Holiness Madhav Ghosh was a master of kirtan. There was no other kirtan master like him in the entire world.
तात्पर्य
श्री माधव, वासुदेव और गोविंद घोष - सभी कीर्तन करने में दक्ष थे। वे साधारण सांसारिक कीर्तन नेताओं जैसे नहीं थे। इसलिए उन्हें वृंदावन के गायक के रूप में संबोधित किया जाता था। जब किसी की सांसारिक धारणाएं पूरी तरह से नष्ट हो जाती हैं, तो हरि की सेवा करने की उनकी प्रवृत्ति बढ़ जाती है। विशेष रूप से, माधव, वासुदेव और गोविंद व्रज के माधुर्य रस के आश्रय-विग्रह [राधा राणी] के व्यक्तिगत विस्तार थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)