श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 248
 
 
श्लोक  3.5.248 
পুনঃ হাসি’ সবেই চলেন পথ যথা
নিজ-দেহ না জানেন, পথের কা কথা
पुनः हासि’ सबेइ चलेन पथ यथा
निज-देह ना जानेन, पथेर का कथा
 
 
अनुवाद
वे फिर हँसे और फिर से सही रास्ते पर चल पड़े। उन्हें अपने शरीर का भी ध्यान नहीं था, रास्ते की तो बात ही क्या।
 
He laughed again and set off on his way again, completely unaware of his own body, let alone the path.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)