vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री चैतन्य भागवत
»
खण्ड 3: अंत्य-खण्ड
»
अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ
»
श्लोक 248
श्लोक
3.5.248
পুনঃ হাসি’ সবেই চলেন পথ যথা
নিজ-দেহ না জানেন, পথের কা কথা
पुनः हासि’ सबेइ चलेन पथ यथा
निज-देह ना जानेन, पथेर का कथा
अनुवाद
वे फिर हँसे और फिर से सही रास्ते पर चल पड़े। उन्हें अपने शरीर का भी ध्यान नहीं था, रास्ते की तो बात ही क्या।
He laughed again and set off on his way again, completely unaware of his own body, let alone the path.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×