श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 235
 
 
श्लोक  3.5.235 
সবার হৈল আত্ম-বিস্মৃতি অত্যন্ত
কার দেহে কত ভাব নাহি তার অন্ত
सबार हैल आत्म-विस्मृति अत्यन्त
कार देहे कत भाव नाहि तार अन्त
 
 
अनुवाद
परिणामस्वरूप, वे स्वयं को पूरी तरह भूल गए। उनके शरीर में प्रकट होने वाले आनंदमय लक्षणों का कोई अंत नहीं था।
 
As a result, he completely forgot himself. There was no end to the blissful symptoms that appeared in his body.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)