मूर्ख नीच पतित दुःखित यत जन
भक्ति दिया कर’ गिया सबारे मोचन”
अनुवाद
“मूर्ख, दुखी, पतित और संकटग्रस्त व्यक्तियों को भक्ति सेवा देकर उनका उद्धार करो।”
“Save the foolish, the unhappy, the fallen and the distressed by offering them devotional service.”
तात्पर्य
श्री गौरासुन्दर ने श्री नित्यानंद प्रभु को गौड़-देश जाने का आदेश दिया। गौड़-देश के सभी बुद्धिमान, अभिजात, विद्वान लोग गौरासुन्दर द्वारा प्रचारित धर्म को स्वीकार करते थे। लेकिन मूर्ख, दुखी, पापी लोग गौरासुन्दर द्वारा प्रचारित कृष्ण की भक्ति सेवा के विषयों को समझ नहीं पाते थे। उन मूर्ख, दुखी, पतित आत्माओं के लाभ के लिए- उन्हें उनकी अधार्मिक प्रवृत्तियों से मुक्त कराने के लिए- श्री गौरासुन्दर ने श्री नित्यानंद को गौड़-देश भेजा। श्री महाप्रभु ने व्यक्तिगत रूप से वादा किया था कि वह सभी अज्ञानी, पतित लोगों को मुक्त करेंगे जो कमोबेश बेकार हैं। लेकिन चूंकि छद्म भक्त जो अपने कर्मों के फल का आनंद लेते हैं जो इंद्रिय तृप्ति से जुड़े हुए हैं और साथ ही निष्पक्ष मायावादी जो मुक्ति की इच्छा रखते हैं, उन सभी को मूर्ख, दुखी और पतित के रूप में शामिल किया गया है, सबसे दयालु भगवान, श्री गौरासुन्दर ने श्री नित्यानंद को उन्हें ऊपर उठाने के लिए भेजा। चूंकि मायावादियों का अत्यधिक अहंकार और अनुष्ठानिक स्मार्तों का कौशल से जन्मा अभिमान परम भगवान की भक्ति सेवा प्राप्त करने में बाधक बन गए, श्री नित्यानंद प्रभु, जो दूसरों के संकट को देखकर दुखी थे, श्रीमान महाप्रभु की आंतरिक इच्छा को पूरा करने के लिए गौड़-देश गए। हालाँकि बंगाल के निवासी अभी भी कमोबेश भावुकता जैसी गलतियों से दूषित हैं, राजस्थानी और गुजराती उनकी महिमा करते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥