श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 217
 
 
श्लोक  3.5.217 
নিরবধি পরানন্দ-রসে উনমত্ত
লখিতে না পারে কেহ—অবিজ্ঞাত-তত্ত্ব
निरवधि परानन्द-रसे उनमत्त
लखिते ना पारे केह—अविज्ञात-तत्त्व
 
 
अनुवाद
वे सदैव दिव्य आनंद के मद में डूबे रहते थे। उनकी अकल्पनीय महिमा को कोई समझ नहीं पाता था।
 
He was always immersed in the intoxication of divine bliss. No one could comprehend his unimaginable glory.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)