vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री चैतन्य भागवत
»
खण्ड 3: अंत्य-खण्ड
»
अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ
»
श्लोक 217
श्लोक
3.5.217
নিরবধি পরানন্দ-রসে উনমত্ত
লখিতে না পারে কেহ—অবিজ্ঞাত-তত্ত্ব
निरवधि परानन्द-रसे उनमत्त
लखिते ना पारे केह—अविज्ञात-तत्त्व
अनुवाद
वे सदैव दिव्य आनंद के मद में डूबे रहते थे। उनकी अकल्पनीय महिमा को कोई समझ नहीं पाता था।
He was always immersed in the intoxication of divine bliss. No one could comprehend his unimaginable glory.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×