vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री चैतन्य भागवत
»
खण्ड 3: अंत्य-खण्ड
»
अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ
»
श्लोक 21
श्लोक
3.5.21
গুণ-গ্রাহী অদোষ-দরশী সবা-প্রতি
ঈশ্বরে বৈষ্ণবে যথাযোগ্য রতি-মতি
गुण-ग्राही अदोष-दरशी सबा-प्रति
ईश्वरे वैष्णवे यथायोग्य रति-मति
अनुवाद
वे दूसरों के केवल अच्छे गुणों को ही देखते थे और किसी में दोष नहीं ढूँढ़ते थे। भगवान और वैष्णवों के प्रति उनके मन में उचित प्रेम और आदर था।
He saw only the good qualities in others and never found fault with anyone. He had genuine love and respect for God and Vaishnavas.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×